लालू की विरासत दांव पर: क्या ‘भाइयों की जंग’ में बुझ जाएगा RJD का ‘लालटेन’?

बिहार चुनाव 2025 से पहले लालू परिवार में कलह चरम पर है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व और तेज प्रताप यादव की महत्वाकांक्षा के बीच फंसी RJD की नैया। जानिए, कैसे यह पारिवारिक ‘महाभारत’ पार्टी के भविष्य को अंधकार में धकेल सकता है।

लालू परिवार में कलह
सियासी ‘महाभारत‘: लालू के ‘कृष्ण-अर्जुन’ में कौन भेदेगा 2025 का चक्रव्यूह?

लालू की विरासत दांव पर: क्या ‘भाइयों की जंग’ में बुझ जाएगा RJD का ‘लालटेन’?

पटना की राजनीतिक गलियों में एक सवाल हवा में तैर रहा है – क्या राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का चुनाव चिह्न ‘लालटेन’ अपने ही घर के चिरागों से लगी आग में भस्म हो जाएगा? बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का काउंटडाउन शुरू हो चुका है और सत्ता पक्ष अपनी रणनीति की बिसात बिछा रहा है, वहीं विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी RJD अपने सबसे बड़े संकट से जूझ रही है – लालू परिवार में कलह। यह कलह अब कोई ढकी-छुपी बात नहीं, बल्कि एक ऐसा खुला ज़ख्म बन चुका है जो पार्टी के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा रहा है।

लालू प्रसाद यादव ने दशकों की राजनीति से जो सामाजिक न्याय का किला खड़ा किया था, आज उसकी दीवारें उनके अपने ही बेटों की महत्वाकांक्षाओं के टकराव से दरक रही हैं। यह सिर्फ दो भाइयों, तेजस्वी और तेज प्रताप, का आपसी मनमुटाव नहीं है; यह एक पूरी राजनीतिक विरासत के भविष्य का सवाल है, जिसका फैसला बिहार की करोड़ों जनता के भाग्य को भी प्रभावित करेगा।

दो ध्रुव, एक विरासत: टकराव की असल वजह

इस पारिवारिक ‘महाभारत’ के केंद्र में दो मुख्य पात्र हैं – तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव। दोनों एक ही खून, एक ही विरासत के वारिस हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली और राजनीतिक सोच दो अलग-अलग ध्रुवों की तरह है।

तेजस्वी यादव: नए युग के ‘अर्जुन’

लालू यादव ने अपने ‘अर्जुन’ के रूप में तेजस्वी को चुना और उन्हें उपमुख्यमंत्री बनवाकर अपनी राजनीतिक विरासत सौंप दी। तेजस्वी ने खुद को एक परिपक्व, शांत और मुद्दों पर केंद्रित नेता के रूप में गढ़ा है। वह पार्टी को आधुनिक बनाना चाहते हैं, A-to-Z की बात करते हैं और MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण से आगे बढ़कर सर्वसमाज को साधने की कोशिश करते हैं। उनका खेमा मानता है कि RJD को अगर भविष्य में प्रासंगिक बने रहना है, तो उसे लालू युग की कुछ पुरानी छवियों से बाहर निकलना होगा।

तेज प्रताप यादव: पिता के ‘कृष्ण’ या बागी राजकुमार?

दूसरी ओर, तेज प्रताप यादव खुद को अपने पिता की कार्बन कॉपी मानते हैं। उनका अंदाज वही ठेठ, बेबाक और आक्रामक है। वह खुद को ‘कृष्ण’ बताते हैं, लेकिन उनकी गतिविधियाँ अक्सर पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर देती हैं। वह RJD के ‘कोर वोट बैंक’ और पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं में अपनी पकड़ का दावा करते हैं। उनका खेमा मानता है कि तेजस्वी के सलाहकार उन्हें पार्टी की जड़ों से काट रहे हैं और ‘असली’ राजद की अनदेखी हो रही है।

यह विचारधारा और कार्यशैली का टकराव ही लालू परिवार में कलह का मूल कारण है।

लालू की विरासत दांव पर: क्या ‘भाइयों की जंग’ में बुझ जाएगा RJD का ‘लालटेन’?

लालू परिवार में कलह सार्वजनिक मंच पर पारिवारिक ‘महाभारत’

यह जंग अब बंद कमरों से निकलकर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों तक आ चुकी है।

  1. बयानों के तीर: तेज प्रताप यादव ने कई बार पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं पर खुलेआम हमला बोला है। उन्होंने तेजस्वी के राजनीतिक सलाहकार संजय यादव को निशाने पर लेते हुए उन्हें दोनों भाइयों के बीच ‘विभीषण’ तक कह डाला।
  2. समानांतर संगठन: पार्टी में अपनी उपेक्षा का आरोप लगाकर तेज प्रताप ने ‘छात्र जनशक्ति परिषद’ और ‘DSS’ जैसे समानांतर संगठन खड़े कर दिए। यह पार्टी के आधिकारिक ढांचे को सीधी चुनौती थी।
  3. सोशल मीडिया वॉर: कई मौकों पर परिवार के सदस्यों, विशेषकर बहनों मीसा भारती और रोहिणी आचार्य के ट्वीट और पोस्ट ने भी इस आग में घी डालने का काम किया है। एक का ट्वीट दूसरे के लिए जवाब माना जाता है, जिससे कार्यकर्ताओं में भ्रम और बढ़ता है।

साइलेंट प्लेयर: मीसा, रोहिणी और राबड़ी देवी की भूमिका

इस भाइयों की जंग में परिवार की महिला सदस्यों की भूमिका भी बेहद अहम है।

  • राबड़ी देवी: पूर्व मुख्यमंत्री और परिवार की मुखिया होने के नाते, राबड़ी देवी हमेशा से ही एक संतुलन साधने वाली शक्ति रही हैं। वह दोनों बेटों को एकजुट रखने की हर संभव कोशिश करती हैं, लेकिन उनकी पकड़ अब पहले जैसी मजबूत नहीं दिखती।
  • मीसा भारती और रोहिणी आचार्य: ये दोनों बहनें भी सत्ता के शक्तिशाली केंद्र हैं। मीसा दिल्ली में रहकर राष्ट्रीय राजनीति पर नजर रखती हैं, तो रोहिणी सिंगापुर से सोशल मीडिया के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं। कई बार वे शांतिदूत की भूमिका में दिखती हैं, तो कई बार उनके बयानों से लगता है कि वे भी किसी एक खेमे के साथ खड़ी हैं।

जमीन पर असर: कार्यकर्ता और वोटर किधर जाएं?

इस शीर्ष नेतृत्व के संघर्ष का सबसे बुरा असर RJD के जमीनी कार्यकर्ता और वोटर पर पड़ रहा है।

  • निष्ठा का संकट: कार्यकर्ता असमंजस में हैं कि वे किसके प्रति अपनी निष्ठा दिखाएं? तेजस्वी भविष्य हैं, तो तेज प्रताप ‘बड़े साहब’ की छवि का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • वोटों का बिखराव: यदि चुनाव के समय तेज प्रताप नाराज होकर अपने कुछ पसंदीदा उम्मीदवारों को निर्दलीय मैदान में उतार देते हैं या भितरघात करते हैं, तो यह RJD के लिए आत्मघाती साबित होगा। कुछ हजार वोटों का अंतर भी कई सीटों पर हार-जीत का फैसला कर सकता है।
  • विपक्ष को मिला हथियार: NDA इस पारिवारिक कलह को ‘डूबता हुआ जहाज’ बताकर प्रचारित कर रहा है। वे इसे मुद्दा बनाकर RJD के शासन करने की क्षमता पर ही सवाल उठा रहे हैं।
लालू परिवार में कलह

काउंटडाउन 2025: क्या एकजुटता एक ‘असंभव सपना’ है?

2025 का चुनाव RJD के लिए अस्तित्व की लड़ाई है। तेजस्वी यादव के लिए यह खुद को लालू के योग्य उत्तराधिकारी साबित करने का आखिरी मौका हो सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चुनाव से पहले यह परिवार एकजुट हो पाएगा?

लालू प्रसाद यादव अपने स्वास्थ्य और कानूनी बंदिशों के बावजूद परिवार को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अब यह लड़ाई व्यक्तिगत अहंकार और राजनीतिक महत्वाकांक्षा की उस ऊंचाई पर पहुंच गई है, जहां से वापसी मुश्किल दिख रही है। अगर RJD को 2025 में NDA के मजबूत किले को भेदना है, तो उसे पहले अपने घर की दरारें भरनी होंगी।

निष्कर्ष:
लालू प्रसाद यादव ने अपनी राजनीति से बिहार में सामाजिक समीकरणों को हमेशा के लिए बदल दिया। लेकिन विडंबना देखिए, आज उनकी विरासत को सबसे बड़ी चुनौती किसी बाहरी ताकत से नहीं, बल्कि उनके अपने ही परिवार के भीतर से मिल रही है। अगर तेजस्वी और तेज प्रताप ने समय रहते यह नहीं समझा कि उनकी असली लड़ाई आपस में नहीं, बल्कि सत्ता के लिए है, तो इतिहास उन्हें ऐसे राजकुमारों के रूप में याद रखेगा जिन्होंने अपने अहंकार में एक जीता-जिताया साम्राज्य गंवा दिया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: तेजस्वी और तेज प्रताप के बीच मुख्य विवाद क्या है?
उत्तर: मुख्य विवाद पार्टी पर नियंत्रण और लालू यादव की राजनीतिक विरासत के नेतृत्व को लेकर है। तेजस्वी पार्टी के सर्वमान्य नेता हैं, जबकि तेज प्रताप पार्टी में अपनी वरिष्ठता और सम्मान की मांग करते हैं।

प्रश्न 2: 2025 के चुनाव पर इस लड़ाई का क्या असर हो सकता है?
उत्तर: इसका सीधा असर RJD की चुनावी संभावनाओं पर पड़ेगा। आंतरिक कलह से वोटों का बिखराव हो सकता है, जिससे कई सीटों पर RJD को हार का सामना करना पड़ सकता है और NDA को फायदा हो सकता है।

प्रश्न 3: क्या लालू यादव इस विवाद को सुलझा सकते हैं?
उत्तर: लालू यादव परिवार के सर्वमान्य मुखिया हैं और उनकी बात का अभी भी सम्मान है। वह विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब दोनों बेटों की अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं, जिससे मामला जटिल हो गया है।

प्रश्न 4: RJD का कार्यकर्ता इस विवाद को कैसे देखता है?
उत्तर: RJD का जमीनी कार्यकर्ता इस विवाद से हताश और भ्रमित है। वह पार्टी को एकजुट देखना चाहता है, लेकिन शीर्ष नेतृत्व के संघर्ष के कारण वह किसी एक पक्ष को चुनने के लिए मजबूर है।

प्रश्न 5: क्या इस कलह का कोई स्थायी समाधान संभव है?
उत्तर: स्थायी समाधान तभी संभव है जब दोनों भाई व्यक्तिगत अहंकार को छोड़कर पार्टी के हित को सर्वोपरि रखें। इसके लिए परिवार के बड़े सदस्यों, विशेषकर राबड़ी देवी और लालू यादव को एक ठोस और निर्णायक भूमिका निभानी होगी।

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